जलवायु परिवर्तन का सामना कैसे किया जाए?

बच्चों, अब तक आपने बहुत सारी जानकारियाँ हासिल कर ली हैं. जलवायु परिवर्तन क्या है, इसके कारण क्या हैं और इंसान की जिन्दगी के अलग अलग पहलुओं पर इसके असर क्या हैं ये भी आपने सीख लिया है. अब हम ये समझने की कोशिश करते हैं कि जलवायु परिवर्तन का सामना कैसे किया जाए.

दुनिया भर के बड़े विशेषज्ञ, वैज्ञानिक और जानकार इस सम्बन्ध में दो महत्वपूर्ण उपायों का जिक्र करते हैं. एक उपाय है कि जिन कारणों से वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी हो रही है उन कारणों पर लगाम लगाईं जाए. और दूसरा उपाय है कि अब तक जितना नुक्सान हो चुका है और जितना बदलाव आ चुका है उस बदलाव के साथ जीना सीखा जाए. इसमें पहले उपाय को शमन कहते हैं. और दूसरे उपाय को अनुकूलन कहते हैं.

शमन
इसे इंग्लिश में मिटिगेशन कहा जाता है. इसका मतलब है कि जिन जिन कारणों से वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसें बढ़ती हैं उन कारणों को कम किया जाए. उनका उत्सर्जन इतना कम कर दिया जाए कि विश्व का तामपान बढना बंद हो जाए. शमन या मिटिगेशन के अधिकाँश उपाय ऊर्जा की खपत कम करने से जुड़े हैं. साथ ही स्वच्छ ऊर्जा के अधिक उपयोग पर भी इन उपायों में बराबर जोर दिया जाता है. ऊर्जा के नए और अधिक विकसित तकनीकें और स्त्रोत जैसे हाइड्रोजन इंधन सेल, सौर उर्जा, नाभिकीय ऊर्जा, समुद्री ज्वार की ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि का इस्तेमाल करने पर इसमें जोर दिया जाता है. इन उपायों से वायुमंडल में प्रदूषण का खतरा बहुत कम होता है.

अनुकूलन
अनुकूलन का सरल भाषा में मतलब है वातावरण में आये बदलावों के साथ जीना सीखना. जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पेनल के अनुसार, अनुकूलन का मतलब है कि धरती के भौतिक, वायुमंडलीय, सामाजिक और आर्थिक तंत्र में आ रहे बदलावों या आने वाले बदलावों के साथ तालमेल बैठाना और उनके साथ जीना सीखना, ताकि हमारी जिन्दगी को कम से कम नुक्सान हो, और हम उन बदलावों का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठा सकें. इस तरह अनुकूलन बदलावों से तालमेल बैठाने की बात है. इससे टिकाऊ विकास का मुद्दा भी हल होता है.

प्रकाशित तिथि:सितंबर 16, 2014
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