भारत में जलवायु परिवर्तन पर रिपोर्टिंग बढ़ रही है: श्री एस. गोपालकृष्ण वारियर

श्री एस. गोपालकृष्ण वारियर
श्री एस. गोपालकृष्ण वारियर
द्वारा प्रकाशित-सितंबर 16, 2014

जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभाव खेती, स्वास्थ्य, जैव-विविधता आदि पर स्पष्ट रूप से नजर आ रहे हैं. आपकी राय में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा क्या है?

श्री एस. गोपालकृष्ण वारियर: भारत का आकार और इसमें मौजूद हर संभव तरह के पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि भारत जलवायु परिवर्तन से जुडी हुई हर संभव समस्या का सामना करने वाला है. हिमालय पिघलते हिमाशैलों के कारण सुभेद्य है, पिघलते हिमशैल अस्थाई झीलों का निर्माण करते हैं और जब इन झीलों को बांधे रखने वाले प्राक्रतिक बंधान टूटते हैं तो जून २०१३ की उत्तराखंड की भीषण बाढ़ जैसे हादसे होते हैं.
हमारे मैदानी इलाके भी तीव्र मौसमी घटनाओं के प्रति सुभेद्य हैं, जैसे कि बाढ़ और सूखे की घटनाओं में बढ़ोतरी, गर्मियों और सर्दियों में क्रमशः तापमान का बहुत अधिक व कम होना. हालाँकि यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात है बदलते तापमान का खाद्य उत्पादन पर पड़ने वाला असर. अगर बदलती परिस्थितियों में गंगा के मैदानों, पंजाब, हरियाणा तटीय आंध्र प्रदेश, और कावेरी डेल्टा में तापमान में बदलाव आता है तो पूरे देश के कुल अनाज उत्पादन पर बुरा असर पड़ने वाला है. इसका ये मतलब नहीं है की देश के अन्य इलाकों में खाद्य उत्पादन पर बुरा असर नहीं पड़ेगा. जब तापमान और बारिश के पेटर्न में बदलाव होगा तो निश्चित ही देशभर के खाद्य उत्पादन पर असर होगा.

नीति निर्माण के स्तर पर जलवायु परिवर्तन हेतु क्या किया जा सकता है ? और सामान्य जन इस दिशा में क्या योगदान दे सकते हैं?

श्री एस. गोपालकृष्ण वारियर: जलवायु परिवर्तन का बेहतर सामना करने के लिए पहली शर्त ये है कि हम ये समझें कि जलवायु परिवर्तन किस तरह के बदलाव किसी ख़ास इलाके में लाने वाला है. वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन पर बनी अंतरसरकारी पेनल ने जो अनुमान व्यक्त किये हैं वे साफ़ बतलाते हैं कि पूरा विश्व और भारत किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. ये अनुमान बतलाते हैं कि दुनिया का औसत तापमान सन २१०० तक २ डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा. और समुद्र स्तर आधे मित्र तक बढ़ जाएगा.
हालाँकि इस व्यापक तस्वीर के उपलब्ध होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर अर्थात राज्य और शहर के स्तर पर तस्वीर स्पष्ट नहीं है. और राज्य व शहरों के लिए इस तरह का विशेष अनुमान या तस्वीर उपलब्ध होने पर ही कोई ख़ास कदम उठाये जा सकते हैं.
नागरिकों के लिए भी, एक सीधा और सरल रास्ता ये है कि वे अपने दैनिक जीवन की आदतों में बदलाव लाकर ग्रीन हाउस गैसों का अधिक उत्सर्जन करने वाले काम कम करें, इसी तरह वे जलवायु परिवर्तन से निपटने में योगदान दे सकते हैं. इसका मतलब ये है कि सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग किया जाए, बिजली और अन्य स्त्रोत से आने वाली ऊर्जा की बचत की जाए, प्राकृतिक संसाधनों की भी बचत की जाए इत्यादी.

क्या आपको लगता है कि भारत को “साझा लेकिन विभेदीकृत उत्तरदायित्व” के सिद्धांत से परे  सोचने की जरूरत है, और कार्बन न्यून अर्थव्यवस्था की दिशा में नेतृत्व देने की आवश्यकता है ?

श्री एस. गोपालकृष्ण वारियर: एक सिद्धांत की तरह “साझा लेकिन विभेदीकृत उत्तरदायित्व” जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में विकासशील देशों को राहत और न्याय प्रदान करता है. यह रिओ सम्मलेन, सन १९९२ के दौरान विकसित किया गया सिद्धांत है जो जलवायु परिवर्तन के लिए संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन को मार्गदर्शन देता है. जलवायु परिवर्तन अभी हाल ही में हो रहे कार्बन उत्सर्जन का ही नतीजा नहीं है बल्कि यह गुजरे समय में हो चुके उत्सर्जन का भी नतीजा है. इसलिए विकासशील देशों पर क्योटो प्रोटोकाल के प्रथम रिपोर्टिंग खंड (वर्ष २००८-१२) तक उत्सर्जन कटौती का कोई दबाव नहीं था.   
यहाँ तक कि उत्सर्जन कम करने संबंधी लक्ष्य पर सहमत न होने पर भी भारत को ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने की दिशा में काम करना चाहिए. क्योंकि जलवायु परिवर्तन का असर भारत पर बहुत ज्यादा पड़ने वाला है. भारत ने संकल्प लिया है कि वह वर्ष २००५ के स्तर तक उत्सर्जन की तीव्रता में २० से २५ प्रतिशत की कमी करेगा. यह काम वर्ष २०२० तक किया जाना है.

जलवायु परिवर्तन जनित पलायन के मुद्दे से कैसे निपटा जा सकता है?

श्री एस. गोपालकृष्ण वारियर: अगर जलवायु और मौसमी बदलावों को लोग अपने मूल निवास में झेलने में असमर्थ रहते हैं तो उन्हें पलायन करना पड़ेगा. इसका एक ही उपाय है और वो है वैश्विक, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पे शमन के उपायों को लागू किया जाए. और स्थानीय स्तर पर समुदायों को अनुकूलन के लिए मदद की जाए. अगर समुदायों को आज की हालात में हो रहे जलवायुवीय उतार चढ़ावों का सामना करना सिखा दिया जाए तो इस बात की बहुत संभावना है कि वे मध्यम और दूरगामी परिवर्तनों का सामना करने में भी सक्षम हो सकेंगे.  

वर्तमान में जलवायु परिवर्तन संचार/संवाद के अतीत और वर्तमान दशा के बारे में आप कुछ कहना चाहेंगे?

श्री एस. गोपालकृष्ण वारियर: जलवायु परिवर्तन संचार भारत में उसी ढंग ढाचे का पालन करता है जैसा कि बाकी दुनिया में होता है. जलवायु परिवर्तन चर्चाओं के पक्षों के वार्षिक सम्मेलन के दौरान और तत्काल बाद में जलवायु परिवर्तन पर बहुत सारी खबरें आती हैं

- वनवर्ल्ड फाउन्डेशन इण्डिया