इंसान और वन्य जीवों के संघर्ष को रोकने के लिए और जतन जरूरी

जिस इंसान को सबसे बुद्धिमान और उदार प्राणी माना गया है, वही सबसे वहशी भी साबित हुआ है। औद्योगिक क्रांति के समय से ही विकास की दौड़ दुनिया के लिए वरदान (आर्थिक रूप से) और अभिशाप (पर्यावरण के लिहाज से) दोनों साबित हुई है। विकास की भूख ने बहुमूल्य वन्य जीवों को नष्ट किया है। वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड फॉर नेचर (डब्लूडब्लूएफ) की ओर से सितंबर 2014 में जारी की गई ‘लीविंग प्लानेट’ रिपोर्ट  के मुताबिक वर्ष 1970 से 2010 के ही दौरान धरती पर मौजूद वन्य जीव प्रजातियों में से 52 फीसदी नष्ट हो गई हैं। इन प्रजातियों के इस व्यापक स्तर पर हुए नुकसान का सीधा असर जलवायु परिवर्तन पर पड़ता है। जैव विविधता के लिहाज से वन्य जीव एक बेहद अहम पहलू हैं और इतनी बड़ी तादाद में हुए नुकसान से प्राकृतिक संतुलन और इस तरह पर्यावरण पर बहुत असर पड़ता है।

हालांकि इंसान अपने कुछ कर्मों का पश्चाताप भी कर सकता है। उदाहरण के तौर पर वन्य जीव प्रजातियों को दुबारा सहेज कर हम प्राकृतिक चक्र को ठीक कर सकते हैं। इसका एक बेहतरीन नमूना संयुक्त राज्य अमेरिका के येलोस्टोन नेशनल पार्क में भेड़ियों को दुबारा स्थापित करना है।

हालांकि भारत के पास दुनिया का सिर्फ 2.4 फीसदी भूभाग है। लेकिन दुनिया भर की 7.3 फीसदी जीव-जंतुओं की प्रजातियां यहीं हैं। हमारे वन्यजीव में रॉयाल बंगाल टाइगर, एक सिंग वाला गैंडा, एशियाई बाघ और तेंदुआ मौजूद हैं। हिमालय ही नहीं पश्चिमी घाट भी हमारे देश में जैव विविधता की खान हैं। पश्चिमी घाट में तो प्राणियों की नई प्रजातियां अभी तक खोजी जा रही हैं। 1972 में बने वन्य जीव कानून ने भी देश में जीवों की प्रजातियों की रक्षा करने में मदद की है।

लेकिन समय बदल रहा है। जानवरों के लगातार हो रहे शिकार और इंसान व जानवरों के बीच संघर्ष ने कई अहम प्रजातियों के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। असम में एक सिंह वाले गेंडे को उसके सिंग के लालच में मारा जाता रहा है। लोगों का अंधविश्वास है कि इस सिंग में बहुत से औषधीय गुण होते हैं। शेर, चीते और हाथी की भी यही कहानी है। इन सभी के अंगों को महंगी कीमत पर बेचने के लिए इनका शिकार किया जा रहा है।
उदाहरण के तौर पर तंदुए को लेते हैं। आम तौर पर माना जाता है कि जंगली जानवर हमारे इलाके में घुस आते हैं। लेकिन असम के गुवाहाटी, महाराष्ट्र के मुंबई और उत्तर प्रदेश के मेरठ से आ रही खबरों से साबित होता है कि हकीकत ठीक इससे उल्टी है। तेंदुए पर खास तौर पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है, क्योंकि शेर और हाथी को बचाने के लिए तो अलग से कार्यक्रम चल रहे हैं, लेकिन तेंदुए के लिए ऐसा कार्यक्रम नहीं है।

सरकारी संरक्षण के बावजूद सारे शेर सुरक्षित नहीं हैं। आम तौर पर जो राष्ट्रीय प्राणि उद्यानों के आस-पास चले जाते हैं, वे सुरक्षित नहीं रहते। कृष्णेंदु बोस की बनाई डॉक्यूमेंट्री ‘द फॉरगॉटेन टाइगर्स’ इन शेरों की दशा को दिखाती है। अनियंत्रित विकास की वजह से ये वन्य जीव अभयारण्य प्रभावित हो रहे हैं और इससे जलवायु परिवर्तन हो रहा है। सच्चाई यह है कि विकास की तलाश ने इंसान को काफी बदल दिया है साथ ही बहुत से वन्य जीव अब विलुप्त हो रही प्रजातियों की सूची में शामिल हो गए हैं। इन हालात के लिए सिर्फ नीति निर्माताओं को दोष देने से भी काम नहीं चलेगा क्योंकि बेहतर, सड़क, जल आपूर्ति और ढांचागत सुविधाओं के लिए हम ही तो हाहाकार भी मचाते हैं।

यह सच है कि इंसान और वन्य जीवों के बीच संघर्ष दुनिया भर में हो रहा है, लेकिन यह उस देश पर निर्भर करता है कि वह इस स्थिति का सामना कैसे करता है। वन्य जीव अभयारण्यों और पार्कों के आस-पास रहने वाले लोगों के बीच इस संबंध में जागरुकता लाना इस लिहाज से एक प्रभावी कदम है। असम के सोनितपुर  का उदाहरण इस संदर्भ में बेहद प्रासंगिक है, जहां इंसान और हाथी के बीच के संघर्ष को डब्लूडब्लूएफ और स्थानीय लोगों की साझेदारी ने बहुत अच्छे से दूर कर लिया। ऐसी परिस्थितियों में वन अधिकारियों के लिए सिर्फ जानवरों में रेडियो कॉलर लगाना काफी नहीं होता। ऐसे मामलों में स्थानीय लोगों को भागीदार बनाना होता है, ताकि वे खुद भी इन प्रयासों में दिलचस्पी लें। इसी तरह भारतीय वन कानून को इस लिहाज से मजबूत बनाना भी एक प्रभावी कदम साबित होगा।
 

विषय-वस्तु:पर्यावरण
प्रकाशित तिथि:जनवरी 28, 2015
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