कार्बन क्रेडिट का कारोबार

युनाइटेड किंगडम की फाइनांसिलय कंडक्ट ऑथरिटी (एफसीए) कार्बन क्रेडिट को परिभाषित करते हुए कहती है कि यह ऐसा सर्टिफिकेट या परमिट है, जो धन के बदले में नियत टन कार्बन डाय आक्साइड (सीओ2) के उत्सर्जन की इजजत देता है। लगातर बढ़ती जागरुकता के साथ वर्ष 1997 में पहली बार इसे क्योटो प्रोटोकॉल के तहत शुरू किया गया था। हालांकि पहली बार कार्बन क्रेडिट वर्ष 2005 में जारी किया जा सका, जब यह संधि व्यवहार में लाई गई। क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म (सीडीएम) के तहत जिन परियोजनाओं को चलाने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करते हैं, उन्हें संयुक्त राष्ट्र की ओर से कार्बन क्रेडिट जारी किया जाता है।

हालांकि भारत क्योटो संधि में शामिल नहीं है, लेकिन इसके बावजूद भारत के कई व्यावसायी इस व्यवस्था का फायदा लेने के लिए जतन कर रहे हैं। पर्यावरण अनुकूल तकनीक का उपयोग कर वे जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के तहत इसका लाभ लेने की कोशिश करते हैं।

दिल्ली मेट्रो उन शीर्ष कारपोरेशनो में शामिल किया जा सकता है जो कार्बन उत्सर्जन कम करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इसकी वेबसाइट बताती है कि संयुक्त राष्ट्र ने इसे दुनिया के पहले मेट्रो के रूप में प्रमाणित किया है, जिसे कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए कार्बन क्रेडिट प्राप्त हुआ। नियमित रूप से अन्य वाहनों का उपयोग करने वालों को विकल्प उपलब्ध करवा कर इसने जिस तरह से प्रदूषण को घटाया है, उसके लिए इसे 6.3 लाख कार्बन क्रेडिट मिला है। अगले सात साल में इसने सालाना 47 करोड़ रुपए मूल्य का कार्बन क्रेडिट हासिल किया। इसने दिल्ली की सड़कों से  91 हजार वाहनों को हटाने में कामयाबी हासिल की।

हालांकि अंतरराष्ट्रीय कार्बन क्रेडिट व्यवस्था की बहुत आलोचना भी होती रहती है। गार्जियन के मुताबिक सरकारों ने अब सीडीएम को गंभीरता ले लेना बंद कर दिया है, इसलिए यह व्यवस्था ध्वस्त हो रही है। अगर ऐसा हुआ तो विकासशील देशों में उत्सर्जन को घटाने के लिए जरूरी धन जुटाना मुश्किल हो जाएगा।

प्रकाशित तिथि:दिसंबर 3, 2014
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