जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में लड़कियों की अहम भूमिका: अशोक खोसला

नई दिल्ली : भारतीय पर्यावरणविद अशोक खोसला ने पिछड़े और विकासशील देशों से अपील की है कि वे अपनी लड़कियों की शिक्षा पर निवेश को बढ़ाएं ताकि कार्बन उत्सर्जन में कमी हो और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में मदद मिल सके।

जलवायु परिवर्तन पर सीआईआई के सम्मेलन में खोसला ने जोर दे कर कहा कि अगर महिलाओं को एक सम्मानजनक जीवन मिले तो कार्बन फुटप्रिंट्स में हम पार्याप्त कटौती कर सकते हैं। उन्होंने कहा, “जिन देशों में महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार होता है, वहां जन्म दर कम होती है। जबकि उन देशों में जहां महिलाओं के साथ अपेक्षाकृत बुरा व्यवहार होता है, वहां जन्म दर ज्यादा होती है। महिलाओं को बेतहर जिंदगी मुहैया करवा कर हम जन्म दर घटा सकते हैं। इससे जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार घटेगी और नतीजतन कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी।”

हरित जीवन शैली पर जोर देते हुए खोसला ने कहा कि मानव समुदायों के लिए दीर्घकालिक विकास का माहैल तैयार करने के लिए जरूरी है कि हम उनके इर्द-गिर्द के ढांचों, पदार्थों के उत्पादन और विकास में जैविक तरीकों पर जोर दें। उन्होंने विकासशील देशों से अनुरोध किया कि वे पर्यावरण संबंधी दबाव को आर्थिक विकास के साथ नहीं जोड़ें।

खोसला ने कहा, “ अगर हमें दीर्घकालिक विकास चाहिए तो हर हाल में इन दोनों को जोड़ कर देखना बंद करना होगा, जिसके मुताबिक जीडीपी बढ़ने के साथ हमारे संसाधनों का उपयोग कम हो जाता है। हालांकि इस लिहाज से हुई थोड़ी शुरुआत के संकेत मिलते हैं, लेकिन हमें इन दोनों को साथ जोड़ कर देखना पूरी तरह से बंद करना होगा। भारत जैसे विकाशील देश इस मामले में एक हद तक सापेक्षिक नजरिया अपना सकते हैं, लेकिन विकसित देशों के लिए तो इस लिहाज से कोई गुंजाइश ही नहीं होनी चाहिए।”

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव अशोक लवासा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक विकास के जोर ने बहुत गंभीर असमानता पैदा कर दी है, इससे दुनिया के पर्यावरण संतुलन को भी खतरा पैदा हो गया है। इस बारे में सावधान करते हुए उन्होंने कहा कि इस लिहाज से ग्रीन क्लाइमेट फंड एक महत्वपूर्ण पहल थी, मगर विकसित देशों की ओर से किए गए वादों के बावजूद अभी तक वादे की रकम नहीं मिल सकी है।

उन्होंने कहा, “ग्रीन क्लाइमेट फंड को सालाना 100 अरब डालर के निवेश का वादा किया गया था, मगर हालत यह है कि अब तक इसे महज 10 अरब डालर ही मिले हैं। जलवायु परिवर्तन को सहारा देने के लिए यह रकम बेहद जरूरी है।”

सीआईआई की जलवायु परिवर्तन परिषद के को-चेयरमैन सुनील वाधवा ने पर्यावरण अनुकूल विकास के तरीके तलाशने की अपील की। उन्होंने कहा, “अगर हमें पर्यावरण पर विकास के असर को सब पर समान रूप से साझा करना है तो जिस तरह भारत में राष्ट्रीय हरित ऊर्जा कोष की व्यवस्था की है, उसी तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हमें ऐसी प्रणाली की शुरुआत करनी होगी, जो कार्बन टैक्स वसूल सके। इससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि अंतिम उपयोगकर्ता उसके लिए भुगतान कर रहा है।”

सीआईआई की ओर से उठाए गए कदमों की जनकारी देते हुए सीआईआई-आईटीसी सेंटर ऑफ एक्सेलेंस फार सस्टेनेबल डेवलपमेंट की कार्यकारी निदेशक सीमा अरोड़ा ने कहा, “अपने ग्रीन बिल्डिंग सेंटर के जरिए हम अब तक दो अरब वर्ग फीट की इमारत की व्यवस्था कर चुके हैं।”

विषय-वस्तु:पर्यावरण
प्रकाशित तिथि:दिसंबर 9, 2014
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