बांस से जलवायु परिवर्तन की लड़ाई को सहारा

नई दिल्ली:  काफी तेजी से बड़ी होने वाली घास की श्रेणी में रखे जाने वाले बांस से ना सिर्फ जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में मदद मिल सकती है, बल्कि यह ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने में भी मददगार साबित होता है। यह विचार सामने आया यहां हो रहे नेशनल बंबू एक्सपो मार्ट 2014 में।

नेशनल बंबू मिशन की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम का मकसद लोगों को बांस को विभिन्न रूप से प्रयोग के लिए उत्साहित करना है, ताकि पर्यावरण को बढ़ावा मिल सके। मध्य प्रदेश राज्य बांस मिशन के मिशन निदेशक एके भट्टाचार्य ने बांस की मदद से हरित भवन निर्माण आंदोलन को बढ़ावा देने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह हरित और स्थायी विकास के लिए एक अहम कारक बन सकता है।

उन्होंने कहा, “यह गांव की महिलाओं को छोटा-मोटा रोजगार मुहैया करवा सकता है और साथ ही भूक्षरण रोकने और जल संरक्षण के लिहाज से भी मददगार होता है। गांवों में हर घर में शौचालय के सपने को पूरा करने के लिए बांस के शौचालय एक व्यवहारिक और सस्ते विकल्प हो सकते हैं।”

उन्होंने कहा कि वे चाहेंगे कि मध्य प्रदेश में किसान बांस लगाने पर ध्यान दें इससे उनके अपने इस्तेमाल के लिए तो बांस उपलब्ध होंगे ही, साथ ही अतिरिक्त आमदनी भी हो सकेगी। भट्टाचार्य के मुताबिक “जमीन के जिन टुकड़ों का उपयोग नहीं हो रहा हो, उन पर बिना किसी अतिरिक्त लागत के बांस आसानी से लगाए जा सकते हैं।”

भट्टाचार्य ने कहा कि अगर हम भवन निर्माण में ईट की जगह बांस का इस्तेमाल करें तो इससे कार्बन उत्सर्जन को घटाने में मदद मिलेगी, क्योंकि ईट के निर्माण में कार्बन फुटप्रिंट बढ़ता है। इससे लोगों का स्वस्थ भी बेहतर होगा, क्योंकि बांस की गोली पेट के लिए भी ठीक होती है और साथ ही कैलेस्ट्राल के स्तर व ब्लड प्रेशर को ठीक रखने में भी यह सहायक होती है।

बच्चों को बांस के फायदों के बारे में जानकारी देने के उद्देश्य से यहां बांस से संबंधित विषयों पर पेंटिंग प्रतियोगिता भी आयोजित की गई थी। इसमें ‘प्रकृति का उपहार बांस’, ‘बांस- स्वच्छ और हरित पर्यावरण’ तथा ‘परंपरा में बांस’ जैसे विषयों को शामिल किया गया था।

इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाली दसवीं की छात्रा धरिती सालूजा बांस के विभिन्न उपयोग के बारे में जान कर काफी उत्साहित थी। उसने कहा, “हमें पता ही नहीं था कि बांस का उपयोग इतनी तरह से हो सकता है। गहने, स्क्रबर, टेबल-मेट, गुलदस्ते, मोबाइल कवर, की-होल्डर और की-चेन जैसी चीजें इससे बनती हैं।”

धरिती ही नहीं, उसके साथ पढ़ने वाली विभा शर्मा और कनिका अग्रवाल ने भी कहा कि वे अब प्लास्टिक की बनी चीजों की जगह बांस की बनी चीजों का इस्तेमाल करना पसंद करेंगी, क्योंकि यह पर्यावरण पर प्रतिकूल असर नहीं डालतीं।

नगालैंड बैंबू डेवलपमेंट एजेंसी (एनबीडीए) की सदस्य अमोंगला सी ने कहा कि यह एजेंसी नगालैंड सरकार ने बांस का उपयोग को बढ़ावा देने के लिए ही बनाई है।

उन्होंने बताया कि “एनबीडीए की ट्रेनिंग के बाद अब गृहणियां, अकेली रहने वाली माताएं और विधवाएं बांस की गोली का अचार जैसी बहुत सी चीजें बना रही हैं। इससे उन्हें आर्थिक ताकत मिलती है और वे आत्म निर्भर बन रही हैं।”

विषय-वस्तु:पर्यावरण
प्रकाशित तिथि:दिसंबर 9, 2014
सभी चित्र को देखें